Thursday, March 16, 2017

चुनाव परिणाम का स्वागत होना चाहिए

●●@साइम इसरार के क़लम से●●
*इससे पहले कि नफरत का बीज डाला जाए*
*हवाओं से कह दो मोहब्बत का तराना गाया जाए*
कहावत तो सुनी होगी
खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे यह कहावत आज के वक्त में बिल्कुल सच साबित हो रही है जब से चुनाव परिणाम आया है उस दिन से लगातार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM)पर सवाल खड़े  करे जा रहे हैं यह सवाल क्यों है आपने इस पर सोचा
अगर इसी तरह पूर्ण बहुमत मायावती या अखिलेश को मिली होती तो कोई सवाल नहीं खड़ा करता लेकिन आज भारतीय जनता पार्टी *(BJP)* को जन समर्थन मिला है उस पर बार-बार सवाल खड़ा करना लोकतंत्र को ठेंगा दिखाने के बराबर है इससे पहले भी समाजवादी सरकार को बहुमत मिली थी
मायावती को बहुमत मिली थी
दिल्ली में केजरीवाल को बहुमत मिली थी
कांग्रेस को बहुमत मिली
तो किसी ने सवाल क्यों नहीं उठाए जो जनादेश मिला उसका स्वागत होना चाहिए और आने वाली सरकार का स्वागत करना चाहिए कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर लगातार अल्पसंख्यकों को डराने की कोशिश हो रही है कि बीजेपी आ गई बीजेपी आ गई बीजेपी आ गई
अगर इतिहास उठा कर देखा जाए तो आप को इस बात का अंदाजा हो जाएगा कि आज तक कांग्रेस ने मुसलमान को सिर्फ वोट बैंक समझा है और इससे ज्यादा कोई हैसियत नहीं समझी लालबत्तियां दे देने से समस्याएं हल नहीं हो जाती लेकिन केंद्र में सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने अभी तक तो ऐसा कोई काम नहीं किया जो मुस्लिम विरोधी हो या मुसलमानों को पीछे करता हो फिर क्यों बार-बार ब्रम्ह फैलाने की कोशिश हो रही है सुलझे हुए दिमाग से यह सोचना होगा कि जो हमारे लिए काम करेगा हम उसे खुले दिल से समर्थन करेंगे पहचान काम से होनी चाहिए बातों से नहीं अगर हमारे लिए कोई अच्छा काम करता है तो हमें उसका स्वागत करना चाहिए और उस का साथ देना चाहिए 
चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद गोरखपुर के मशहूर सांसद योगी आदित्यनाथ ने अपने पहले पत्रकार वार्ता में कहां कि *"यह सरकार सबके लिए काम करेगी यह सरकार विकास के लिए काम करेगी इस सरकार में किसी के भी साथ भेदभाव नहीं होगा"*
*पत्रकार ने पूछा क्या अल्पसंख्यकों को डरने की जरूरत है उस पर जवाब दिया इस सरकार में मुसलमानों को डरने की कोई जरूरत नहीं हां जो गलत लोग हैं उन्हें जरूर डरना होगा*
हमें इस बात की तारीफ क्यों नहीं करना चाहिए जब हम किसी की आलोचना करना चाहते हैं तो उसकी तारीफ करना क्यों नहीं जानते तुम्हारा दिल इतना बड़ा क्यों नहीं हो सकता इस बात पर आपने कभी नहीं सोचा होगा नजर का फर्क होता है क्या देखना है आपको अच्छा है या बुरा अच्छी नजर से देखोगे अच्छा दिखेगा बुरी नजर से तो बुरा ही दिखेगा यह तो आपको सोचना है अच्छा देखना है या बुरा देखना हैं।

*ना चाहते हुए भी आज मैंने यह लेख उन लोगों के लिए लिखा है जो लगातार ब्रम्ह फैलाने की कोशिश कर रहा हूं*

Sunday, February 26, 2017

धर्म कोई भी हो इंसान बनने के लिए शिक्षा की जरूरत है

●●●●साइम इसरार के कलम से ●●●●●
मुसलमानों की सियासत करने से हमें कुछ नहीं मिलने वाला बहुत मुत्तहिद हो कर देख लिया यूपी में जितना मुत्तहिद हुए उतना ही साम्प्रदायिकता का वोट बैंक मुत्तहिद हो गया मुझे तो ऐसा लगता है कि हमें सेक्युलरिज्म का बोझ अपने कंधों पर उठाने की आदत डाल लेनी चाहिए ।
जब तक तालीम में मजबूत नहीं है तब तक इस बारे में सोचना निहायती बेवकूफी होगी क्योंकि जब कभी भी हमने किसी को अपना कयादत माना है ,तब तब हमारे साथ धोखा और छल-कपट हुई है आदमी ताकत के नशे में इतना चूर हो जाता है कौम के असली मसाइल तो पीछे छूट जाते हैं और बचा-कूचा हमारे बिकाऊ रहनुमा जिन्हें हम निर्दलीय चुनते हैं वह पूरा कर देते हैं वक्त और हालात की नजाकत को देखते हुए हमें जज्बात से ना फैसला लेकर दिमाग से फैसला लेना होगा हमें, अपनी कौम को तालीम में आगे ले जाकर खड़ा करना होगा जहां से हम एक नई इबारत लिख सकें कोई भी कौम उस वक्त तक कामयाब नहीं होती है जब तक सिर्फ अपने बारे में सोचे अगर हम अपने बारे में सोचते हैं तो सोचना हमें उन गरीब लोगों के बारे में भी है उन बेबस लोगों के बारे में भी है उन अनपढ़ लोगों के बारे में भी सोचना है जो किसी और धर्म से ताल्लुक रखते हैं ताकि हम सब का विकास हो सके और शिक्षा किसी एक धर्म के लिए नहीं है हर धर्म में कहा गया है कि तालीम हासिल करो इसीलिए  तो हर धर्म की अलग-अलग किताबे हैं वह पढ़ कर इंसानियत सीखने के बारे में है ना कि धर्म की ठेकेदारी करने के लिए।

जब तक हम तालीम याफ्ता नहीं हो जाती तब तक राजनीति अपनी हद तक की करना बेहतर होगा क्योंकि इस सियासत के चक्कर में हमारे असली मसाइल पीछे छूट जाते हैं और हम अपनी छोटी मोटी समस्याओं पर वक्त बर्बाद करना शुरू कर देते हैं हमारी बुनियादी समस्याएं तभी हल हो सकती हैं जब हर घर से बच्चा अच्छी तालीम हासिल करें बेहतर यह होगा कि जो लोग सियासती स्टेज से मेहनत करते हैं वह लोग कौम को तालीम देने में मदद करें जितना वक्त हमारे रहनुमा सियासत में बर्बाद करते हैं उतना वक्त अगर हम शिक्षा के क्षेत्र में लगाएं तो हमारे हालात में बदलाव आ सकता है पढ़ लिख कर जब हम अपनी मेहनत के बलबूते अपनी ताकत बनाने की कोशिश करेंगे तो उससे हमारी बुनियादी समस्याएं हल हो सकती हैं इसके लिए हमें अभी से आगाज करना होगा ताकि हम ब्यूरोक्रेसी पर कब्जा कर सकें ब्यूरोक्रेसी सफर का वह स्टेशन है जहां से हमारा सफर लंबा तो होगा लेकिन कामयाबी जरूर मिलेगी मैं तो यही सोचता हूं।
हो सकता है आपकी सोच मुझसे मुख्तलिफ हो सकती है और आप मुझसे बेहतर जानते हो सकते है
आज के लिए इतना ही है आगे आप सोचिए और मुझे भी सोचने का मौका दीजिए वैसे तो लोग यह कहते हैं सोचने से कुछ नहीं बदलता करने से बदलता है

Sunday, February 12, 2017

यूपी का चुनावी चक्रव्यू

●●●@ साइम इसरार के कलम से ●●●
●●● यूपी का चुनावी चक्रव्यू ●●●प्रदेश का विधानसभा चुनाव हमेशा से एक बड़ा मसला रहा है उसकी वजह यह है राजनीतिक पंडित कहते हैं दिल्ली के सिंहासन का रास्ता लखनऊ होकर निकलता है इसका मतलब यह की जो लखनऊ में सरकार बनाएगा बिना उसकी मदद के दिल्ली में सरकार बनाना असंभव है।
जैसा कि पिछले लोकसभा चुनाव में देखने को मिला अल्पसंख्यक वोटरों के एक बड़े बिखराव से सांप्रदायिक ताकतें मजबूत हुई और केंद्र में बीजेपी की सरकार बनी कुछ इस से ही मिलता जुलता अब यूपी चुनाव के विधानसभा चुनाव में दिख रहा है अल्पसंख्यक वोटर का बिखराव बीजेपी को मदद कर रहा है वजह बड़ी साफ है ,समाजवादी कांग्रेस गठबंधन और  बसपा के उम्मीदवार दोनों ही जगह मुस्लिम मतदाताओं के वोट बिखराव से सांप्रदायिक ताकतें मजबूत हो रही हैं जैसे कि लोकसभा चुनाव में देखने को मिला था ,
कई लोकसभा सीटें ऐसी हारी जहां बसपा और समाजवादी आपस में लड़ती रह गई और भारतीय जनता पार्टी का कमल खिल गया सबसे बड़ा उदाहरण मुस्लिम बहुल क्षेत्र संभल मैं शफीकुर्रहमान वर्क साहब की मात्र 5000 वोटों से हार और मुरादाबाद की सीट पर भी यही हुआ बचा कुचा वोट पीस पार्टी के मुस्लिम रहनुमाओं ने काट लिए रामपुर में भी यही देखने को मिला था समाजवादी उम्मीदवार मजबूत थे लेकिन उनके वोट कांग्रेस और  बसपा ने  बीजेपी का कमल खिलवा दिया।
जब राजनैतिक ज्ञानियों ने गणित लगाया तो पता यह चला कि बहुजन समाज पार्टी का अपना दलित वोट सीधे बीजेपी को ट्रांसफर हो गया और अल्पसंख्यक वोटर साफ शब्दों में कहा जा है तो मुस्लिम वोटर बीएसपी के और समाजवादी और कांग्रेस तीनों में आपस में इतनी बुरी तरह बट गया जिससे कि बीजेपी को बहुत बड़ा फायदा हुआ ,
परिवार की 5 सीटों पर समाजवादी पार्टी तो किसी तरह अपनी इज्जत बचाने में कामयाब रही  लेकिन मायावती की बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश में एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी , उधर कांग्रेस ने भी दो सीटें जीती ,कांग्रेस और सपा में वोट बंटवारे को लेकर कई सीटे हरी थी अब दोनों के गठबंधन से देखना दिलचस्प होगा के यूपी को यह साथ कितना पसंद आता है और कितना अखिलेश जी का #काम बोलता है
अब तक की चुनावी गणित देखा जाए तो कुछ चुनावी सर्वे को छोड़कर सब कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के गठबंधन को बहुमत देते देख रहे हैं और इनको सीधी टक्कर भारतीय जनता पार्टी दे रही है अब अगर सरकार बनाने के लिए मायावती की पार्टी बीएसपी और बीजेपी मिल जाते हैं तो यूपी में मायावती की सरकार बन जाएगी लेकिन अभी तो फिलहाल अखिलेश यादव और राहुल गांधी का यूपी को साथ पसंद आ रहा है और समाजवादी कांग्रेस गठबंधन सबसे मजबूत दिखाई देता है वही अगर बीएसपी मजबूर कर देती है तो सीधे फायदा बीजेपी को पहुंचेगा फिर सत्ता पर काबिज समाजवादी पार्टी की जगह हाथी का परचम लहरा सकता है ,
मायावती जहां गुंडाराज को अपना सबसे बड़ा मुद्दा मानती हैं ,वही अखिलेश विकास को सबसे बड़ा मुद्दा मानते हैं और भारतीय जनता पार्टी मोदी के नाम पर चुनाव लड़ रही है अब देखना यह है  यूपी का वोटर किसके सर पर ताज रखता है, एक बात और बड़ी महत्वपूर्ण है के लोकसभा चुनावों की बात अलग थी जब मोदी जी को देश का प्रधानमंत्री बनाने के लिए जनता ने ठान ली थी लेकिन यह उत्तर प्रदेश का चुनाव उससे बिलकुल अलग है ,यहां के मुद्दे भी दूसरे हैं और चेहरे भी अलग जिन की धमक राजनीति में बहुत पुरानी है एक तरफ तो दो युवा चेहरे एक साथ खड़े हैं जो विकास की बात करते हैं एक तरफ मायावती जी खड़ी हैं जो गुंडा राज की बात करती हैं और एक तरफ भारतीय जनता पार्टी है मोदी जी के चेहरे के नाम पर वोट मांग रही है देखना दिलचस्प होगा किसकी बात से जनता संतुष्ट होती है और किसके सर यह ताज जाता है क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत जनता की है और 5 साल बाद जनता के दरबार में इन बड़े बड़े नेताओं को आना ही होता है वरना जनता की सुनता कौन है ।
चुनाव के बाद ना कोई पूछने वाला है और ना कुछ बताने वाला तभी किसी शायर ने यह कहा है ।
"गरीबों की प्लेट में पुलाव आ गया लगता है फिर यूपी में चुनाव आ गया"

Sunday, February 5, 2017

नीता अंबानी और विजय माल्‍या MMS हुआ लीक,दांव पर लगी अंबानी खानदान की इज्जत! – वीडियो देखें

इस समय सोशल मीडिया पर नीता अंबानी और विजय माल्या का एक वीडियो वायरल हुआ है .जिसमे वे नीता अंबानी के साथ में रास रचाते हुए नजर आ रहे है . यूट्यूब वीडियो के माध्‍यम से जितना सच फैलाता है उतना झूट भी। यही हाल इस वीडियो का भी है।

इस वीडियो में एडिटिंग के माध्‍यम से नीता अंबानी और विजय माल्‍या को रास रचाते और उनका लव एंगल दिखाया गया है। बल्‍कि इस विडीयो की सच्‍चाई यह है कि इसमें अंबानी फैमिली की प्राइवेट पार्टी को दिखाया गया है

Thursday, February 2, 2017

बच्चों के ख्वाब भी शहर के बच्चों के ख्वाबों से मिलते-जुलते

@●●●साइम इसरार के कलम से●●●●●
शहर से दूर पक्की सड़क से कच्ची सड़क की ओर एक पतले से रास्ते पर दोनों तरफ लगे हुए लंबे-लंबे पेड़ एक अलग भारत की तस्वीर दिखाते है कुछ दूर चलने के बाद एक छोटा सा गांव जहां ना तो बिजली और ना पानी की सही व्यवस्था वही टूटे-फूटे पुराने रोड और बच्चों की पीठ पर लगा हुआ बस्ता एक कहानी बयां करता है छोटे-छोटे मासूम बच्चे सुबह सवेरे कंधे पर किताबों का बोझ लिए अपने भविष्य की नई परिभाषा लिखने को जा रहे थे कुछ देर रुक कर उनसे बात हुई तो पता चला उन बच्चों के ख्वाब भी शहर के बच्चों के ख्वाबों से मिलते-जुलते हैं लेकिन अफसोस उनको वह साहूलाते मोहया नहीं है जो शहर के बच्चों को है ना तो स्कूल जाने का साधन है और ना ही अच्छे स्कूलों की व्यवस्था लेकिन सपनों में कोई फर्क नहीं था सपने वही जो शहर के बच्चों के होते हैं उनसे ही मिलते हुए थे उन बच्चों की आंखों में मैंने बड़े ख्वाबों को पढ़ा था एक बच्चे ने बताया रात को मिट्टी के तेल से जले हुए लैंप की रोशनी में वह अपनी जिंदगी के ख्वाबों की जंग लड़ रहे हैं मेरे लिए यह कोई नया अनुभव नहीं था आश्चर्यजनक जरूर था क्योंकि मैं दो अलग-अलग भारत को देख रहा था और मुझे फर्क भी नजर आने लगा कुछ देर बात होने पर पता चला पिताजी के पास इतने पैसे नहीं के वह हमें बड़े स्कूल में पढ़ा सकें लेकिन वह सरकारी स्कूल भी उनके लिए कोई छोटा नहीं था भले ही वहां कंप्यूटर की शिक्षा ना हो लेकिन उन बच्चों का दिमाग एक कंप्यूटर से कम भी नहीं लगा कुछ सवाल पूछने पर महसूस हुआ यह भी अपने गांव के google हैं देश के राष्ट्रपति से लेकर अर्थव्यवस्था और ना जाने कौन से मुद्दे जो मुझे भी मालूम नहीं थे उन्होंने 2 मिनट में समझा दिए मालूमात उनकी कम थी लेकिन इतनी भी कम नहीं कि मैं नहीं समझ पाता तभी अचानक एक बच्चे ने बताया पिताजी सुबह काम पर चले जाते हैं और हम अपने काम पर पिताजी का काम मजदूरी करना है और हमारा काम पढ़ाई करना पिताजी के और मेरे काम में फर्क इतना है कि वह शाम को आकर सो जाते हैं और मैं 12:00 बजे तक एक टिमटिमाती हुई रोशनी के साथ अपने भविष्य की लड़ाई लड़ता हूं मैंने पूछा इतनी जानकारी कहां से मिलती है तो जवाब बड़ा ही अजीब था स्कूल से लौटते वक्त गांव की चौपाल पर बड़े बूढ़ों की हुक्के की गड़गड़ाहट के बीच थोड़ा समय बैठ जाते हैं उनकी बातें सुनकर हमें यह जानकारी मिल जाती है और कुछ गुरु जी की बातों से जिंदगी की जंग के दो अलग अलग रुप मैंने देखे यह मेरे लिए एक अलग ही अनुभव था यह कोई बड़ी बात नहीं थी लेकिन इन बातों ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया थोड़ा दिमाग आप भी लगाइए क्या फर्क है शहर और गांव के बच्चों के बीच इन बच्चों का सफर भी अधूरा है लेकिन काबलियत पूरी है

एक अधूरा सफ़र   #पाठ- बचपन की आज़ादी और बदलाव

#किताब - #एक_अधूरा_सफ़र एक अधूरा सफ़र
  #पाठ- बचपन की आज़ादी और बदलाव

मुझे बचपन के दिन अच्छी तरह याद है 26 जनवरी मनाने के लिए कई दिन पहले से तैयारियां शुरु कर दी जाती थी देश प्रेम के गाने अक्सर हमारे कानों को छूते हुए दिल में उतर जाते थे वह बचपन में एक अलग सी खुशी का अहसास दिलाते थे, दुनियादारी से अनजान बस 26 जनवरी मनाने का जुनून रात को ख्वाब में भी नजर आता था बचपन था तो यह भी नहीं पता कि 26 जनवरी को कहते क्या है कई सालों बाद पता लगा के गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस में क्या फर्क है हमें तो बस इतना ही मालूम था आज खुशयो का दिन है आजादी का सही मतलब भी नहीं पता था लेकिन हां मिठाई खाने की खुशी जरुर हुआ करती थी ,
26 जनवरी आने से पहले ही दिल में खुशियां अपना अड्डा बना लेती कि 26 जनवरी को स्कूल में मिठाई मिलेगी अब जैसे जैसे उम्र बढ़ती गई वैसे वैसे मिठाई का रूप बदलता चला गया पहले मिठाई लड्डू को कहा करते थे फिर कुछ सालों बाद उसकी शक्ल इमरती में हुई और आज के वक्त में चॉकलेट ने उसकी जगह ले ली है, चलो उससे क्या होता है मिठाई तो आखिर मिठाई है लेकिन अब वह बचपन का जमाना भी तो नहीं रहा जब खूब शैतानियां करते थे और 26 जनवरी आते ही प्रोग्राम की तैयारियों में लग जाते थे गाने भी अक्सर "मेरा रंग दे बसंती चोला" "मेरे देश की धरती उगले सोना"  एक अलग खुशियां लेकर आते थे जैसे मिठाई का रूप बदला और हमारी उम्र बदली उसी तरह गानों की जगह भी बदलती चली गई अब गाना "चक दे इंडिया" हो गया है लेकिन दिल में देश भक्ति का जुनून और तिरंगे की शान वही बचपन वाली है सुबह जेब के ऊपर तिरंगा लगा कर स्कूल जाने वाले दिन अब नहीं रहे लाल किले पर हो रहा जश्न रेडियो पर सुनने की जगह अब टीवी ने जरूर ले ली है, लेकिन मेरा देश तो नहीं बदला हां हम जरूर बदल गए दिल तो करता है वही बचपन का दिन वही पुरानी यादें और पुराना सुकून मिल जाए लेकिन भागती दौड़ती दुनिया में यह सब कहानियां हैं ।
उस समय तो मिठाई की खुशी में यह भी नहीं पता होता था कि इस दिन का असली मकसद क्या है आज सब कुछ पता है लेकिन वह मिठाई की खुशी नहीं है वह बचपना नहीं है वह दोस्त भी नहीं जो हमारे साथ खड़े होकर तिरंगे को सलामी देते थे अब तो ऐसा लगता है 15 अगस्त  या 26 जनवरी जिस दिन होती है उसी दिन देश भक्ति की बातें होती हैं
अब तो हम बड़े हो गए हैं लेकिन अपने अंदर के उस बच्चे को जिंदा करना होगा जो मिठाई की उम्मीद में भागा चला जाता था
The Saaim Israr Club #Bachpan #Ek_Adhoora_Safar #Republic_Day

Tuesday, December 27, 2016

●● साइम इसरार के कलाम से किसान का दर्द●●●

◆●● साइम इसरार के कलाम से किसान का दर्द●●●

मेरा होश खो गया लहू के उबाल में, कैदी होकर रह गया हूं इसी सवाल में, आत्महत्या की चिता पर देख कर किसान को ,
नींद कैसे आ रही है देश के प्रधान को

हिंदुस्तान में 3 लाख लोग ऐसे हैं जो बिना खाए सो जाते हैं जिन्हें दो वक्त की रोटी नहीं मिलती जिन्हें यह नहीं पता कि रात को क्या खाना है या भूखे ही सो जाना है और 14 हजार किसान पिछले 5 साल में भुखमरी के शिकार होकर आत्महत्या कर लेते हैं यह वही भारत है जिसके कुल 26 लोग दुनिया के एक हजार अमीर लोगों में गिनती आती है जिस देश के 24 करोड़ आबादी गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी जीती हो और ना जाने ऐसे कितने नजारे रात को 9:00 बजे के बाद बड़े-बड़े शहरों की सड़कों पर आपको  देखने को मिल जाएंगे जो फुटपाथ पर अखबार बिछाए दो वक्त की रोटी कमाने की जद्दोजहद में इस ठंड के मौसम में आराम की नींद ले रहे हैं आराम इसलिए कह रहा हूं क्योंकि वह इतना थक जाते हैं क्यों नहीं यह भी नहीं पता लगता कि मौसम कितना ठंडा है या गर्म यह सब कोई आम बात नहीं है मेरा सवाल उन लोगों से है जो दो वक्त की भर पेट रोटी खा लेते हैं और उन्हें यह भी नहीं पता कि कितने आज भूखे सोए हैं ऐसा क्यों है आजादी के इतने साल बाद भी आज भी भूखमरी और किसानों की आत्महत्या इस देश में क्या बता रही है
यह हमसे सवाल पूछ रही है कौन से विकास की बातें करते हो पहले दो वक्त की रोटी का इंतजाम कर लो,  आपको यह भी बताता चालू इस देश में जितने भी कलेक्टर हैं सब को एक फंड मिलता है जो भूखमरी राहत कोस्ट के नाम से होता है  उस फंड का क्या इस्तेमाल होता है और इसी तरह न जाने कितने फंड जो विधायको और सांसदों को विकास के नाम पर दिए जाते हैं मेरा सीधा सवाल हमारे नेताओं सांसदों और विधायकों से हैं जोकि अपने अपने इलाकों में भूखमरी रोकने में नाकाम हुए हैं अगर हिंदुस्तान को आजाद हुए सालों के बाद भी हम इस स्थिति पर खड़े हैं उसका जिम्मेदार कौन है और कौन से विकास की बात होती है मुझे तो यही समझ नहीं आता इस देश का अन्नदाता किसान है और किसानों  कर्ज में डूबे हुए है बड़े बड़े उद्योगपतियों का कर्ज माफ हो जाता है और किसान कर्ज के चक्कर में आत्महत्या कर लेता है कभी उस पर ब्याज की मार कभी उस पर मौसम की मार आटा खरीदते हुए कभी नहीं सोचा होगा यह  कहां से आता है और इसके लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है इतना जरूर सोचा होगा आरे अटा 20 रुपए किलो है इतना महंगा हर 5 साल पर नई सरकारें बन जाती हैं नए नेता बदल जाते हैं मगर देश का हाल नहीं बदलता और किसान अपने पुराने दिनों की तरह जिंदगी से लड़ता हुआ दो वक्त की रोटी कमाने में लगा रहता है
अब तो किसान भी कहना गलत होगा क्योंकि कोई किसान यह नहीं चाहता कि उसका बेटा कभी किसान बने उसकी तरह परेशानियां उठाए उसकी तरह कर्ज में डूबा रहे उसकी वजह यही है कि हमने हमेशा से किसान को नीची नजर से देखा है जब किसान की बात आई तो सब चुप हो गए जब भूखमरी की बात आई तो सब चुप हो गए जब आत्महत्या की बात आई तो सब चुप हो गए बस हुई तो राजनीती हुई किसी की मौत पर भी रोटियां सेकने से बाज नहीं आए किसी की चिता का भी सौदा कर लिया गया तो कभी उसे वोट बैंक में बदल लिया गया लेकिन इस सब से क्या फायदा आपको तो भर पेट खाना मिल ही गया आपके लिए तो किसान मेहनत कर ही रहा है वह जिंदगी की जद्दोजहद में लगा हुआ है शायद किसी तरह यह जिंदगी गुजर जाए काश कभी तो अच्छे दिन आए कभी तो यह नारा भी सच हो कि बदल रहा है देश बदल रहा है किसान बड़े बड़े मुद्दे आते हैं और चले जाते हैं बड़े-बड़े नारे आते हैं और चले जाते हैं नेताओं के भाषण तो मैं सुन सुन कर थक गया हूं मैं इसे ढोंग कहूंगा
एक किसान तो किसान है उसे किसी के धर्म से क्या मतलब उसे किसी कार वाले की जिंदगी से क्या मतलब उसे क्या पता ac के कमरे क्या होते हैं उसे तो बस यह पता है कि गर्मी हो या सर्दी उसे तो अपने खेत पर जाकर मेहनती करनी है ताकि उसके बच्चे दो रोटी खा सकें उसके घर में खाना बन सके हां यह बात अलग है कि वह तुम्हारे खाने के लिए इतनी मेहनत कर रहा है ताकी तुम्हारे घर तक खाना पहुंच सके उसमें उसका लालच ही तो है ताकि उसके बच्चे भूखे ना मरे सरकारी हजारों स्कीम तो बनाती हैं कभी किसान विकास योजना है तो कभी कोई और लेकिन किसान तो वहीं का वहीं खड़ा है जमीने कम हो गई खेत कम हो गए लेकिन पेट भरने के लिए जंग तो अभी जारी है जब हमारी रीढ़ की हड्डी इतनी कमजोर होगी तो हम कौन से विकास की बात करेंगे अडानी अंबानी होते तो कर्ज माफ हो जाता एक गरीब किसान कर्ज कौन माफ करेगा दो-चार नेता पैदा होते भी हैं तो वह भी शांत होकर बैठ जाते हैं और जो इमानदार उन्हें आगे ही नहीं बढ़ने दिया जाता इस सबके बीच देश विकास कर रहा है, मेरा देश बदल रहा है और ना जाने कौन कौन से नारे इस देश की तरक्की और झूठा आईना पेश करने के लिए काफी है अगर तुम्हें सच्चा हिंदुस्तान असली हिंदुस्तान देखना है तो निकलो अपने घर से और 20 25 किलोमीटर दूर जाकर किसी उस गांव को देखो जहां पर आज भी बिजली नहीं है जहां आज भी पीने को साफ पानी नहीं है जहां आज भी दिन 5:00 बजे निकल जाता है और रात शाम को 6:00 बजे हो जाती है जहां एक इंसान अपने बच्चों का पेट भरने के लिए दिनभर मेहनत करता है और शाम को घर लौटता है तो खाली कभी मौसम की मार कभी बैंक का नोटिस उसकी परेशानियां और बढ़ा देता है

लेकिन हमें इस सब से क्या फर्क पड़ता है आखिर हमारे पास तो पैसे हैं हमारे पास तो खाने को सामान है और एक किसान हमारे लिए कर तो रहा है ताकि हमारे घर में गेहूं-चावल आ सके और हम भूखे ना सोए जो इंसान तुम्हारे घर तक खाना पहुंचा रहा है उसके लिए तुम्हारा वोट क्या कर रहा है यह तुमसे सवाल करता है तुम तो विकास के नाम पर वोट देते चले जाते हो लेकिन क्या वह सरकार जिसे तुम वोट दे रहे हो उस गरीब किसान की सुध लेती है वह एक गरीब किसान की बात करती है जिसके ऊपर आज भी 20 25 हजार का कर्जा कितना बड़ा है कि उसे चुकाना मुश्किल है अगर इस देश का सही मायने में तुम्हें विकास करना है तो इस देश के किसान को शसक्तीकरण करना होगा जब तक इस देश का किसान शक्तिशाली नहीं होगा जब तक यहां पर भुखमरी खत्म नहीं होगी तब तक इस देश में विकास होना असंभव है क्योंकि हम और तुम हर तरीके से अगर जुड़े हैं तो वह किसानों से जुड़े हैं भले ही तुम मत सोचो लेकिन सच्चाई को नकार नहीं सकते और अगर आपको आज भी मेरी बात पर यकीन ना हो तो शाम को जब अपने परिवार के साथ खाना खाने बैठे तो सवाल करना अपने आप से क्या मेरी बात गलत है